जिक्रे अहमद जो करता है रमजान में
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जिक्रे अहमद जो करता है रमजान में
उसका इमा निखरता है रमजान में 
सहरी व इफ्तार की बरकतों से मका
नूर सा जगमगाता है रमजान में

जिक्रे अहमद जो करता है रमजान में
सब गुलामानै अहमद ना है ना क्यों
अबरे रहमत बरसता है रमजान में
जो भी रोजा रखता है खुदा के लिए
उसका चेहरा चमकता है रमजान में

जिक्रे अहमद जो करता है रमजान में
उसका इमा निखरता है रमजान में 
वक्ते इफ्तार कहने लगा हर कोई
कितना अच्छा यह लम्हा है रमजान में
अजमतों का महीना है यह नूर का
धारा हर सम्त बहता है यह रमजान में
जिक्रे अहमद जो करता है रमजान में

मकता 
बिलयकी है वह हकदार ए खोलदे बरी 
ए निजामी जो मरता है रमजान में
जिक्रे अहमद जो करता है रमजान में
उसका इमा निखरता है रमजान में 

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